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क्या दो पंक्तियाँ वह कह सकती हैं, जो कई पन्ने भी नहीं कह पाते?
ग़ज़ल की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है। नवाइयत – नवा की ग़ज़लें में नवीन जोशी 'नवा' की 163 ग़ज़लें हैं। हर ग़ज़ल अशआर से बनी है। हर शे'र अपने आप में पूरा है, और सारे शे'र मिलकर एक एहसास रचते हैं।
ये ग़ज़लें हिंदी में हैं, पर इनमें उर्दू शायरी की रवानी और लफ़्ज़ों की ख़ुशबू है। इनमें मोहब्बत, इंतज़ार, वस्ल और जुदाई की बातें हैं। घर-परिवार, रिश्तों की उलझनें, आत्म-सम्मान, संघर्ष, वक़्त और तक़दीर की बातें भी हैं। बहुत मुमकिन है कि किसी शे'र में आपको अपना ही कोई एहसास मिल जाए, जिसे आप शब्द नहीं दे पाए थे।
किताब की शुरुआत शाइर की स्वर्गीय माँ को समर्पण और एक आत्मीय प्रस्तावना से होती है। 'नवा' दरअसल उनकी माँ का प्यार भरा संबोधन था, जो आगे चलकर उनका तख़ल्लुस बना। नवाइयत नवीन जोशी का पहला ग़ज़ल संग्रह है।
इस किताब में आपको मिलेंगी:
नवाइयत को आप कहीं से भी खोलकर पढ़ सकते हैं, या शुरू से आख़िर तक। यह उन पाठकों के लिए है जो शायरी, ग़ज़ल और मुशायरों से प्यार करते हैं। यह उनके लिए भी है जो आज के दौर की ऐसी हिंदी ग़ज़लें पढ़ना चाहते हैं जो अपनी-सी लगें।
नवीन जोशी, जो 'नवा' तख़ल्लुस से शाइरी करते हैं, पेशे से कंपनी सेक्रेटरी हैं और मन से शाइर। उनकी शाइरी में सोच की गहराई, रचनात्मकता और शैली की नवीनता है। उनकी ग़ज़लें रेख़्ता और कविता कोश पर सूचीबद्ध हैं, और वे मुशायरों के पसंदीदा शाइर हैं। वे इंशाद फाउंडेशन के प्रवर्तक हैं, जो उभरते हुए युवा शाइर और शाइरात को मंच देती है। नवाइयत उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है।